शासन का आदेश को ताक पर रखकर मनदीप किरार को दिए दो प्रभार नियमों की उड़ाई धज्जियां
संजय अग्रवाल // जनपद पंचायत खिरकिया में मनरेगा के रिक्त सहायक यंत्री पद का प्रभार संविदा के उपयंत्री को दिए जाने के बाद मामला और गंभीर हो गया है। अब सामने आए शासन के लिखित आदेश ने पूरे प्रकरण में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आदेश में न केवल रिक्त पद पर प्रभार देने की स्पष्ट प्रक्रिया तय की गई है, बल्कि यह भी साफ शब्दों में कहा गया है कि सहायक यंत्री का प्रभार मिलने के बाद संबंधित अधिकारी केवल प्रभारी सहायक यंत्री के रूप में ही कार्य करेगा और उपयंत्री के रूप में कार्य नही कर सकेगा। यानी अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि उपयंत्री को सहायक यंत्री का प्रभार क्यों दिया गया, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रभार देने से पहले शासन द्वारा निर्धारित सभी शर्तों और पात्रता की जांच की गई थी?
नियम विरुद्ध दोनों प्रभार एक व्यक्ति को ही क्यों दिए?
मनरेगा योजना के तहत प्रदेश की समस्त जनपद पंचायतों में सहायक यंत्री के रिक्त पदों पर कार्य व्यवस्था के लिए जारी आदेश क्रमांक 2086/स्था/NR-2/मनरेगा/2025 में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि सहायक यंत्री का प्रभार दिए जाने के बाद संबंधित अधिकारी मात्र प्रभारी सहायक यंत्री के रूप में कार्य संपादित करेगा। आदेश में इससे भी आगे स्पष्ट किया गया है कि उपयंत्री के रूप में कार्य संपादन पूरी तरह निषिद्ध रहेगा तथा किसी भी दशा में दोनों प्रभार एक ही व्यक्ति के पास नहीं होने चाहिए।ऐसे में खिरकिया में जिस उपयंत्री मंदीप किरार को मनरेगा सहायक यंत्री का प्रभार सौंपा गया है, वहां अब यह जांच का विषय बन गया है कि क्या प्रभार मिलने के बाद उन्होंने उपयंत्री के रूप में अपने मूल दायित्वों से स्वयं को अलग किया या दोनों जिम्मेदारियां साथ-साथ निभाई जा रही हैं?
शासन ने पात्रता तक तय कर रखी, फिर किस आधार पर हुआ फैसला
आदेश में यह भी प्रावधान है कि यदि अपरिहार्य स्थिति में उपयंत्री को सहायक यंत्री का प्रभार देना पड़े तो जिले में पदस्थ ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के वरिष्ठ उपयंत्री को ही प्रभार दिया जाए। इतना ही नहीं, आदेश में सेवा अवधि की न्यूनतम शर्त भी रखी गई है। डिग्रीधारी उपयंत्री के लिए 8 वर्ष और डिप्लोमाधारी उपयंत्री के लिए 10 वर्ष से कम सेवा अवधि वाले उपयंत्री को प्रभार नहीं दिया जाना चाहिए। क्या संबंधित उपयंत्री शासन द्वारा निर्धारित सेवा अवधि पूरी करते हैं? क्या वे जिले के वरिष्ठ उपयंत्री हैं? क्या उनसे वरिष्ठ और पात्र अधिकारी उपलब्ध नहीं थे? यदि उपलब्ध थे तो उन्हें दरकिनार करने का कारण क्या था? प्रभार देने से पहले सक्षम अधिकारी की अनुमति ली गई थी या नहीं? अब शासन के आदेश ने बढ़ाई गंभीरता मनरेगा उपयंत्री को सहायक यंत्री का प्रभार आखिर किस नियम और किस आधार पर दिया गया? शिकायतकर्ता संजय अग्रवाल द्वारा मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई है। शिकायत में प्रभार आदेश की तारीख, सक्षम अधिकारी की अनुमति, संबंधित अधिकारी की तकनीकी पात्रता, वरिष्ठता, सेवा अवधि, कार्य विभाजन और विभागीय प्रक्रिया की जांच की मांग की गई है।
लोकायुक्त शिकायत का भी उल्लेख, फिर जिम्मेदारी देने पर सवाल
मामले से जुड़ी शिकायत में संबंधित उपयंत्री के विरुद्ध लोकायुक्त में शिकायत लंबित है। इसके बाद भी संविदा वर्ग के उपयंत्री को सहायक यंत्री का प्रभार कैसे दे दिया गया और एक साथ दोनों प्रभार का दायित्व निभाया जा रहा है तो क्या शासन का ये आदेश लागू हुआ या फाइलों में ही रह गया? जब शासन ने नियम बना दिए कि एक व्यक्ति के पास उपयंत्री और प्रभारी सहायक यंत्री दोनों का प्रभार नहीं हो सकता, तो खिरकिया में व्यवस्था किस नियम के तहत की गई?
कलेक्टर-सीईओ से जांच की मांग,
अब निगाहें कार्रवाई के मामले में जिला पंचायत सीईओ, कलेक्टर सहित संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों से जांच की मांग की गई है। शिकायत में मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के प्रमुख सचिव, प्रमुख अभियंता, संभागायुक्त सहित वरिष्ठ अधिकारियों को भी अवगत कराया गया है अब देखना यह है कि शासन के स्पष्ट आदेश और अखबार में प्रकाशित खबर के बाद जिला प्रशासन इस मामले को महज कागजी शिकायत मानकर छोड़ता है या आदेश की एक-एक शर्त की जांच कर जिम्मेदारी तय करता है। क्योंकि मामला सिर्फ एक प्रभार का नहीं है सवाल यह है कि शासन के आदेश जनपदों में लागू होते हैं या फिर जिम्मेदार अधिकारियों की सुविधा के हिसाब से उनकी व्याख्या की जाती है?